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ईश्वर को न मानने में कौन कौन सी हानियां हैं? By वनिता कासनियां पंजाब? ईश्वरजैसे ही चोर और लुटेरे बढ़ते हैं, वैसे ही आम नागरिक सतर्क हो जाते हैं। इसी तरह, नास्तिकों के उत्पीड़न के बाद हमारे लोगों की आस्था और ईश्वर के प्रति भावनाएं भी बढ़ती हैं । 200 साल का ब्रिटिश शासन और 500 साल का मुगल साम्राज्य हमारे देश से विश्वासियों का सफाया करने में विफल रहा । मुगलों ने नालंदा पर हमला किया और नौ मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया गया । इतिहास में ऐसे कई हमले हुए हैं, लेकिन भारतीयों का ईश्वर पर से विश्वास नहीं टूटा ।संसार के सारे प्रयास अहंकार की तृप्ति की ओर निर्देशित हैं । दुनिया में मां-बच्चे का रिश्ता निस्वार्थ होता है, लेकिन मां-बाप को भी अपने बच्चों से उम्मीदें होती हैं । हमें बताओ, भगवान में हमारी आस्था का स्वार्थ क्या है? भगवान में विश्वास न करने में क्या बुराई है?ईश्वर में विश्वास न करने का नकारात्मक पक्ष?नास्तिक हो या अज्ञेय, हर कोई बीमारी का शिकार है । अंतर यह है कि विश्वासी परहेज करने में सक्षम हैं क्योंकि उन्होंने पवित्रशास्त्र के निषेधों का पालन किया है । जब वे बीमार होते हैं, तो वे आसानी से डॉक्टर द्वारा निर्धारित आहार से संबंधित परहेज कर सकते हैं। लेकिन एक नास्तिक के लिए ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि वह स्वतंत्र होने का आदी है ।आस्तिक और पूजा पाठ करने वाले व्यक्ति स्वाभाव से सांत होते हैं । पूजा पाठ में लगे ऐसे व्यक्तियों को गुस्सा न के बराबर ही आता है । जबकि नास्तिक व्यक्ति का मिजाज बड़ा तेज होता है । अपने इसी स्वभाव के कारण ऐसे व्यक्ति जल्द ही लड़ाई भिड़ाई की मुसीबत में पड़ जाते हैं । इनका गुस्सा जल्द ही बेकाबू हो जाता है और ये अपने से बड़ों के का अपमान करने से खुद को रोक नहीं पाते और समाज में अपना मान-सम्मान खो देते हैं ।जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं और आस्तिक होते हैं उनका स्वभाव शांत होता है । ऐसे उपासकों को विरला ही कभी क्रोध आता है । जबकि नास्तिक बहुत भावुक होते हैं । इस स्वभाव के कारण ऐसा जातक युद्ध में शीघ्र ही संकट में पड़ सकता है । उनका गुस्सा जल्द ही बेकाबू हो जाता है, और वे अपने बड़ों को ठेस पहुँचाने से पीछे नहीं हटते और समाज में अपना मान सम्मान खो देते हैं ।तीसरा नुकसान खाने-पीने का है। अधिकांश विश्वासी अपना भोजन भगवान को अर्पित करने के बाद ही खा सकते हैं। अब पिज्जा, मोमोज देवताओं को नहीं चढ़ाए जा सकते, इसलिए इस प्रकार के लोग देवताओं को चढ़ाकर केवल तवे पर पका हुआ शुद्ध भोजन ही खा सकते हैं। ऐसा भोजन करने से श्रद्धालु अनेक रोगों के शिकार से मुक्त हो जाते हैं। और नास्तिकों के पास इन हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध करने का कोई कारण नहीं है इसलिए इनके बीमार होने की संभावनाएं बड़ जाती हैं ।भगवान पर अविश्वास बढ़ाता है अपराधनास्तिक नर्क और स्वर्ग में विश्वास नहीं करते। ऐसे लोग झूठ, व्यभिचार और चोरी जैसे बुरे गुणों को नहीं छोड़ते क्योंकि उन्हें नरक में जाने का डर नहीं होता है। अगर समाज में ऐसे बहुत से लोग होंगे, तो पूरा समाज अराजकता में शासन करेगा और कोई भी शांति से नहीं रहेगा। सरकार इन लोगों से बहुत नाराज़ रहती है, लेकिन उन्हें रोक नहीं सकती क्योंकि ऐसा करने वालों को जेल जाने का भी डर नहीं रहता।यदि सारे लोग ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो समाज में भयानक बुराई होगी । कुछ पैसे के लिए लोग हत्या, चोरी और झूठ बोलना शुरू कर देंगे । यह सब आज कुछ हद तक हो रहा है, लेकिन यह इतना घातक नहीं है कि कोई घर से बाहर ही न निकल पाए । जहां तक ​​भारत की बात है तो यहाँ आस्तिकों की बड़ी संख्या के कारण चोरी, हिंसा और भ्रष्टाचार के काम ही मामले देखने को मिलते हैं । वहीं अगर हम एक ऐसे देश की बात करें जहां के लोग नास्तिक हैं तो यहां चोरी, डकैती और यहां तक ​​कि खून-खराबा तक आम बात है । ऐसे नास्तिक देश में पुलिस भी डर के साये में रहती है, आम लोगों की तो बात ही क्या।ईश्वर के होने के प्रमाणज्योतिषीय विद्वानों ने पहले बुध, बृहस्पति और शुक्र जैसे ग्रहों के लिए तिथियों के साथ पचास साल पहले ही कैलेंडर तैयार किए थे । इस प्रत्यक्ष प्रमाण से अवश्य ही कोई सर्वज्ञ जीव रहा होगा जो समय-समय पर इन ग्रहों को गतिमान करता है । अगर कोई कहता है कि प्रकृति इन ग्रहों में हेरफेर कर रही है, तो यह गलत है क्योंकि यह प्रकृति भी उन ग्रहों की तरह निष्क्रिय है । यदि कोई इसे प्राकृतिक चेतना कहता है तो अपने शब्दों में हम इसे ही सर्वशक्तिमान ईश्वर कहते हैं ।एक गाय खाती है घास, इसके नतीजतन गाय हमें दूध देती है । गाय को पालने में बहुत मेहनत लगती है, और बछड़े के जन्म के कुछ महीने बाद तक ही गाय दूध दूध दिया करती है। गाय जहां इस ईश्वरीय क्षमता से दूध बनाती है, वहीं बैल भी घास खाता है, लेकिन दूध क्यों नहीं देता? यदि आप कहते हैं कि इन सभी व्यवस्थाओं को प्राकृतिक चेतना द्वारा व्यवस्थित किया जाता है, तो हम इस चेतना को सर्वोच्च ईश्वर कहते हैं ।Vnita kasnia punjabआपको बता दें कि वैज्ञानिकों ने एक भी ऐसी मशीन नहीं बनाई है जो घास से दूध बना सके । अगर ऐसा होता, तो दूध, जो आज मिल पाना मुश्किल है, प्लास्टिक की कीमत पर सड़क पर बेचा जाता । दोस्तो आज की पोस्ट के लिए बस इतना ही । आप चाहें तो अगले लेख के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । ग्रुप में शामिल होने के लिए यहां क्लिक करें – Join Whatsapp । दोस्तो कृपया इस लेख को किसी भी व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर जरूर करें । मित्रों, आजकल लोगों के पास न तो क्षेत्रीय ज्ञान है और न ही शास्त्रीय । क्या आप जानते हैं कि आपका यह योगदान किसी की जिंदगी भी बदल सकता है । फिर मिलेंगे एक और नयी पोस्ट के साथ जिसकी जानकारी आपको व्हाट्सप्प ग्रुप में दी जाएगी । अंत तक बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !



ईश्वर को न मानने में कौन कौन सी हानियां हैं?


ईश्वर

जैसे ही चोर और लुटेरे बढ़ते हैं, वैसे ही आम नागरिक सतर्क हो जाते हैं। इसी तरह, नास्तिकों के उत्पीड़न के बाद हमारे लोगों की आस्था और ईश्वर के प्रति भावनाएं भी बढ़ती हैं । 200 साल का ब्रिटिश शासन और 500 साल का मुगल साम्राज्य हमारे देश से विश्वासियों का सफाया करने में विफल रहा । मुगलों ने नालंदा पर हमला किया और नौ मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया गया । इतिहास में ऐसे कई हमले हुए हैं, लेकिन भारतीयों का ईश्वर पर से विश्वास नहीं टूटा ।

संसार के सारे प्रयास अहंकार की तृप्ति की ओर निर्देशित हैं । दुनिया में मां-बच्चे का रिश्ता निस्वार्थ होता है, लेकिन मां-बाप को भी अपने बच्चों से उम्मीदें होती हैं । हमें बताओ, भगवान में हमारी आस्था का स्वार्थ क्या है? भगवान में विश्वास न करने में क्या बुराई है?


ईश्वर में विश्वास न करने का नकारात्मक पक्ष?

नास्तिक हो या अज्ञेय, हर कोई बीमारी का शिकार है । अंतर यह है कि विश्वासी परहेज करने में सक्षम हैं क्योंकि उन्होंने पवित्रशास्त्र के निषेधों का पालन किया है । जब वे बीमार होते हैं, तो वे आसानी से डॉक्टर द्वारा निर्धारित आहार से संबंधित परहेज कर सकते हैं। लेकिन एक नास्तिक के लिए ऐसा करना मुश्किल है क्योंकि वह स्वतंत्र होने का आदी है ।

आस्तिक और पूजा पाठ करने वाले व्यक्ति स्वाभाव से सांत होते हैं । पूजा पाठ में लगे ऐसे व्यक्तियों को गुस्सा न के बराबर ही आता है । जबकि नास्तिक व्यक्ति का मिजाज बड़ा तेज होता है । अपने इसी स्वभाव के कारण ऐसे व्यक्ति जल्द ही लड़ाई भिड़ाई की मुसीबत में पड़ जाते हैं । इनका गुस्सा जल्द ही बेकाबू हो जाता है और ये अपने से बड़ों के का अपमान करने से खुद को रोक नहीं पाते और समाज में अपना मान-सम्मान खो देते हैं ।

जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं और आस्तिक होते हैं उनका स्वभाव शांत होता है । ऐसे उपासकों को विरला ही कभी क्रोध आता है । जबकि नास्तिक बहुत भावुक होते हैं । इस स्वभाव के कारण ऐसा जातक युद्ध में शीघ्र ही संकट में पड़ सकता है । उनका गुस्सा जल्द ही बेकाबू हो जाता है, और वे अपने बड़ों को ठेस पहुँचाने से पीछे नहीं हटते और समाज में अपना मान सम्मान खो देते हैं ।

तीसरा नुकसान खाने-पीने का है। अधिकांश विश्वासी अपना भोजन भगवान को अर्पित करने के बाद ही खा सकते हैं। अब पिज्जा, मोमोज देवताओं को नहीं चढ़ाए जा सकते, इसलिए इस प्रकार के लोग देवताओं को चढ़ाकर केवल तवे पर पका हुआ शुद्ध भोजन ही खा सकते हैं। ऐसा भोजन करने से श्रद्धालु अनेक रोगों के शिकार से मुक्त हो जाते हैं। और नास्तिकों के पास इन हानिकारक खाद्य पदार्थों का विरोध करने का कोई कारण नहीं है इसलिए इनके बीमार होने की संभावनाएं बड़ जाती हैं ।

भगवान पर अविश्वास बढ़ाता है अपराध

नास्तिक नर्क और स्वर्ग में विश्वास नहीं करते। ऐसे लोग झूठ, व्यभिचार और चोरी जैसे बुरे गुणों को नहीं छोड़ते क्योंकि उन्हें नरक में जाने का डर नहीं होता है। अगर समाज में ऐसे बहुत से लोग होंगे, तो पूरा समाज अराजकता में शासन करेगा और कोई भी शांति से नहीं रहेगा। सरकार इन लोगों से बहुत नाराज़ रहती है, लेकिन उन्हें रोक नहीं सकती क्योंकि ऐसा करने वालों को जेल जाने का भी डर नहीं रहता।

यदि सारे लोग ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, तो समाज में भयानक बुराई होगी । कुछ पैसे के लिए लोग हत्या, चोरी और झूठ बोलना शुरू कर देंगे । यह सब आज कुछ हद तक हो रहा है, लेकिन यह इतना घातक नहीं है कि कोई घर से बाहर ही न निकल पाए । जहां तक ​​भारत की बात है तो यहाँ आस्तिकों की बड़ी संख्या के कारण चोरी, हिंसा और भ्रष्टाचार के काम ही मामले देखने को मिलते हैं । वहीं अगर हम एक ऐसे देश की बात करें जहां के लोग नास्तिक हैं तो यहां चोरी, डकैती और यहां तक ​​कि खून-खराबा तक आम बात है । ऐसे नास्तिक देश में पुलिस भी डर के साये में रहती है, आम लोगों की तो बात ही क्या।

ईश्वर के होने के प्रमाण

ज्योतिषीय विद्वानों ने पहले बुध, बृहस्पति और शुक्र जैसे ग्रहों के लिए तिथियों के साथ पचास साल पहले ही कैलेंडर तैयार किए थे । इस प्रत्यक्ष प्रमाण से अवश्य ही कोई सर्वज्ञ जीव रहा होगा जो समय-समय पर इन ग्रहों को गतिमान करता है । अगर कोई कहता है कि प्रकृति इन ग्रहों में हेरफेर कर रही है, तो यह गलत है क्योंकि यह प्रकृति भी उन ग्रहों की तरह निष्क्रिय है । यदि कोई इसे प्राकृतिक चेतना कहता है तो अपने शब्दों में हम इसे ही सर्वशक्तिमान ईश्वर कहते हैं ।

एक गाय खाती है घास, इसके नतीजतन गाय हमें दूध देती है । गाय को पालने में बहुत मेहनत लगती है, और बछड़े के जन्म के कुछ महीने बाद तक ही गाय दूध दूध दिया करती है। गाय जहां इस ईश्वरीय क्षमता से दूध बनाती है, वहीं बैल भी घास खाता है, लेकिन दूध क्यों नहीं देता? यदि आप कहते हैं कि इन सभी व्यवस्थाओं को प्राकृतिक चेतना द्वारा व्यवस्थित किया जाता है, तो हम इस चेतना को सर्वोच्च ईश्वर कहते हैं ।

Vnita kasnia punjab

आपको बता दें कि वैज्ञानिकों ने एक भी ऐसी मशीन नहीं बनाई है जो घास से दूध बना सके । अगर ऐसा होता, तो दूध, जो आज मिल पाना मुश्किल है, प्लास्टिक की कीमत पर सड़क पर बेचा जाता । दोस्तो आज की पोस्ट के लिए बस इतना ही । आप चाहें तो अगले लेख के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । ग्रुप में शामिल होने के लिए यहां क्लिक करें – Join Whatsapp । दोस्तो कृपया इस लेख को किसी भी व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर जरूर करें । मित्रों, आजकल लोगों के पास न तो क्षेत्रीय ज्ञान है और न ही शास्त्रीय । क्या आप जानते हैं कि आपका यह योगदान किसी की जिंदगी भी बदल सकता है । फिर मिलेंगे एक और नयी पोस्ट के साथ जिसकी जानकारी आपको व्हाट्सप्प ग्रुप में दी जाएगी । अंत तक बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !

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कलयुग का कड़वा सच – लड़कियों का अपने ही घर में शोषण होगा।   By वनिता कासनियां पंजाब= कलयुग का कड़वा सच आपको बता दें कि इस कलियुग में लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं। कलियुग का कड़वा सच है कि लड़कियों का अपना परिवार उनके साथ व्यभिचार करेगा और इस कलयुग में तो लोगों की फसल और पानी भी चोरी हो जायेंगे । हिंदू धार्मिक ग्रंथों में दी गई जानकारी के अनुसार कलियुग के अंत में अभी काफी समय बाकी है। क्योंकि, ब्रह्मपुराण के अनुसार, कलियुग की आयु उनकी 43,200 वर्ष है और कलियुग अभी शुरू हो रहा है। , जिसका पहला चरण चल रहा है। माना जाता है कि कलियुग की शुरुआत 302 ईशा पूर्व हुई थी । इसका अर्थ यह हुआ कि कलियुग को अभी 5,120 वर्ष ही हुए हैं और कलियुग में 4,26,888 वर्ष शेष हैं, लेकिन ब्रह्मप्राण में कलियुग के अंत की व्याख्या कैसे की गई है? ब्रह्मपुराण के अनुसार, कलियुग के अंत में मानव आयु केवल 12 वर्ष की बताई गयी है । इस दौरान लोगों में नफरत और नाराजगी बढ़ जाती है । कलियुग मे मानवता बिलुप्त हो जाएगी कलयुग का कड़वा सच है कि जैसे जैसे कलयुग की उम्र बढ़ती जाएगी वैसे वैसे नदियां सूखती जाएगी । बेइमानी और अन्याय से धन ...