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बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रमभगवान श्री राम ने किस तरह तोड़ा सुग्रीव का घमंड वनिता कासनियां पंजाब द्वाराजब भगवान श्री राम वनवास में थे तो दुष्ट एवं अधर्मी रावण माता सीता का हरण कर लिया, रामायण में बताया गया है कि जब भगवान सुग्रीव से मदद मांगने गए तो सुग्रीव ने भगवान श्री राम की अवहेलना कर दी क्योंकि सुग्रीव उन्हें साधारण इंसान समझने की भूल कर बैठे ।भगवान श्री राम का वनवास समस्त असुरों के संहार के लिए ही था और ऐसा ही हुआ । लेकिन भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में अवतरित हुए थे इसलिए उन्होंने अपने आचरण से बताया कि एक आदर्श पुत्र, राजा, पति, भाई अथवा एक आदर्श मनुष्य को केसा होना चाहिए ।भगवान चाहते तो एक क्षण में ही रावण को मार सकते थे लेकिन उन्होंने आदर्श व्यवहार का प्रदर्शन करते हुए सुग्रीव से मदद लेने का विचार किया ।सुग्रीव द्वारा भगवान राम की परीक्षासुग्रीव ने पहली गलती तो यह कर दी कि जब भगवान श्री राम उनके राज्य में आए तो उन्होंने श्री राम की परीक्षा के लिए हनुमान जी को भेजा ।दूसरी गलती सुग्रीव ने यह कर दी कि जब भगवान श्री राम और लक्ष्मण उनके पास आए तो उन्होंने श्री राम को बैठने के लिए स्थान दिया लेकिन लक्ष्मण जी को बैठने के लिए स्थान नहीं दिया । हनुमान जी ने सुग्रीव के घमंड को देखते हुए लक्ष्मण जी के लिए बैठने का स्थान दिया और खुद उनके उनके चरणों के पास बैठ गए ।तीसरी गलती जो सुग्रीव ने की वह है भगवान के शस्त्र कौशल की परीक्षा । सुग्रीव ने कहा कि वह भगवान श्री राम की मदद तभी करेंगे जब वह यह सिद्ध करें कि वे रावण को मारने में समर्थ हैं ।इसी का परीक्षण कराने के लिए सुग्रीव ने भगवान श्री राम को जंगल में भेजा जहां उनसे सात पेड़ गिराने के लिए सुग्रीव ने कह । भगवान श्री राम ने एक ही बाण से सातों पेड़ों को गिरा दिया । फिर उनसे हड्डियों के बने पहाड़ों को तोड़ने के लिए कहा गया और भगवान ने एक ही बाण में पहाड़ के परखिच्छे उड़ा दिए ।सुग्रीव को अभी भी यह समझ नहीं आया कि उसने घमंडवश भगवान को साधारण समझने की भूल कर दी है और परीक्षा लेकर उनको परेशान करने का पाप अपने सिर ले लिया है ।सुग्रीव ने भगवान श्री राम के सामने रखी आखिरी शर्तअंत में सुग्रीव ने कहा कि अगर भगवान श्री राम बालि का वध करके उसका राज्य सुग्रीव को दिला दें तो वे श्री राम की मदद करेंगे ।दरसल बालि सुग्रीव का भाई था और बहुत ही अधिक ताकतवर था । एक बार उसने रावण को अपने हाथों में दबाकर सातों द्वीपों की सैर कराई थी । तब से रावण बालि से बहुत अधिक डरता था और इसके पास नहीं आता था । एक बार की बात है बालि के राज्य पर एक राक्षस ने हमला कर दिया और बालि और उनके भाई सुग्रीव उसका वध करने के किए बाहर निकले ।राक्षस एक गुफा के अंदर चला गया और बालि भी उसे मारने के लिए अंदर चला गया । बालि ने गुफा के द्वार पर सुग्रीव को तैनात किया ताकि वो राक्षस गुफा के द्वार से बाहर ना भाग पाए । सुग्रीव ने देखा कि गुफा के अंदर से खून की नदी बह रही है और अंदर से किसी के चिल्लाने की आवाज आ रही है ।सुग्रीव ने सोचा कि राक्षस ने उसके भाई बालि को मार डाला है और वह अब सुग्रीव के राज्य को हड़प लेगा । यह सोचकर सुग्रीव ने गुफा का द्वार एक बहुत बड़े पत्थर से बंद कर दिया । सुग्रीव ने जब वापिस जाकर राज्य में यह खबर दी कि बालि की मृत्यु हो गई है तो सुग्रीव को किसकिंधा का नया राजा बना दिया गया ।असल में बालि जिंदा बच गाया और उसने राक्षस को मार डाला । राक्षस को मारकर जब बालि वापिस आया तो उसने गुफा का द्वार बंद पाया । बालि लगा कि सुग्रीव ने राज्य के लालच में उसे धोका दिया है । बलि ने अपने राज्य में जाकर सुग्रीव को बहुत बुरी तरह मारा । सुग्रीव ने समझाने की कोशिश की लेकिन बलि नहीं माना ।सुग्रीव जैसे तैसे अपनी जान बचाकर भागे और अपना राज्य खो बैठे । सुग्रीव ने कहा कि बिना राज्य के वो भगवान श्री राम की मदद नहीं कर सकते इसलिए अगर भगवान सुग्रीव को उनका राज्य वापिस दिला दें तो वे उनकी मदद जरूर करेंगे । भागवान श्री राम सुग्रीव की शर्त को मान गए ।सुग्रीव का घमंड हुआ चूरभगवान श्री राम ने योजना बनाई कि सुग्रीव जाकर बलि को युद्ध के लिए बुलाएंगे और भगवान श्री राम बाण मारकर उसे मार देंगे । बालि को यह वरदान प्राप्त था कि सामने वाले की आधी शक्ति उसके पास आ जाती थी और इसलिए बालि को कोई हारा नहीं पाता था ।सुग्रीव ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा । बालि गुस्से में आग बबूला हो गया और सुग्रीव को मारने के लिए बाहर आया । भगवान श्री राम ने सुग्रीव को एक माला दी थी जिससे सुग्रीव की पहचान हो सके । दरअसल बालि और सुग्रीव एक जैसे ही दिखते थे, बालि ने एक ही वार में सुग्रीव के गले की माला तोड़ दी ।असल में भगवान को सुग्रीव को पहचानने के लिए माला की कोई जरूरत नहीं थी फिर भी भगवान ने बालि को नहीं मारा और सुग्रीव को पिटने दिया । बालि ने सुग्रीव को बहुत मारा और सुग्रीव की जान बहुत ही मुश्किल से बची ।सुग्रीव को लगा कि माला के टूट जाने की वजह से यह सब हुआ है लेकिन भगवान के प्रति पिछली तीन चार गलतियां करने की वजह से ही सुग्रीव को इतनी मार पड़ी ।दूसरी बार सुग्रीव ने अच्छे से माला पहनी और बालि को युद्ध के लिए ललकारा । इस बार भी बालि ने सुग्रीव के गले में पड़ी माला को पहले हीर वार में तोड़ दिया । इस बार सुग्रीव ने सोच लिया कि अब उनके प्राण नहीं बचेंगे । लेकिन इस बार भगवान श्री राम ने बालि को तीर मार दिया और उसकी वहीं पर ही मृत्यु हो गई ।इसी तरह की अध्यात्मिक और ज्ञानवर्धक पोस्ट की जानकारी पाने की लिए हमारे ब्लॉग ग्रुप से जुडें । ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें – Join बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम Groupबाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

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भगवान श्री राम ने किस तरह तोड़ा सुग्रीव का घमंड

जब भगवान श्री राम वनवास में थे तो दुष्ट एवं अधर्मी रावण माता सीता का हरण कर लिया, रामायण में बताया गया है कि जब भगवान सुग्रीव से मदद मांगने गए तो सुग्रीव ने भगवान श्री राम की अवहेलना कर दी क्योंकि सुग्रीव उन्हें साधारण इंसान समझने की भूल कर बैठे ।

भगवान श्री राम का वनवास समस्त असुरों के संहार के लिए ही था और ऐसा ही हुआ । लेकिन भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में अवतरित हुए थे इसलिए उन्होंने अपने आचरण से बताया कि एक आदर्श पुत्र, राजा, पति, भाई अथवा एक आदर्श मनुष्य को केसा होना चाहिए ।

भगवान चाहते तो एक क्षण में ही रावण को मार सकते थे लेकिन उन्होंने आदर्श व्यवहार का प्रदर्शन करते हुए सुग्रीव से मदद लेने का विचार किया ।


सुग्रीव द्वारा भगवान राम की परीक्षा

सुग्रीव ने पहली गलती तो यह कर दी कि जब भगवान श्री राम उनके राज्य में आए तो उन्होंने श्री राम की परीक्षा के लिए हनुमान जी को भेजा ।

दूसरी गलती सुग्रीव ने यह कर दी कि जब भगवान श्री राम और लक्ष्मण उनके पास आए तो उन्होंने श्री राम को बैठने के लिए स्थान दिया लेकिन लक्ष्मण जी को बैठने के लिए स्थान नहीं दिया । हनुमान जी ने सुग्रीव के घमंड को देखते हुए लक्ष्मण जी के लिए बैठने का स्थान दिया और खुद उनके उनके चरणों के पास बैठ गए ।

तीसरी गलती जो सुग्रीव ने की वह है भगवान के शस्त्र कौशल की परीक्षा । सुग्रीव ने कहा कि वह भगवान श्री राम की मदद तभी करेंगे जब वह यह सिद्ध करें कि वे रावण को मारने में समर्थ हैं ।

इसी का परीक्षण कराने के लिए सुग्रीव ने भगवान श्री राम को जंगल में भेजा जहां उनसे सात पेड़ गिराने के लिए सुग्रीव ने कह । भगवान श्री राम ने एक ही बाण से सातों पेड़ों को गिरा दिया । फिर उनसे हड्डियों के बने पहाड़ों को तोड़ने के लिए कहा गया और भगवान ने एक ही बाण में पहाड़ के परखिच्छे उड़ा दिए ।

सुग्रीव को अभी भी यह समझ नहीं आया कि उसने घमंडवश भगवान को साधारण समझने की भूल कर दी है और परीक्षा लेकर उनको परेशान करने का पाप अपने सिर ले लिया है ।

सुग्रीव ने भगवान श्री राम के सामने रखी आखिरी शर्त

अंत में सुग्रीव ने कहा कि अगर भगवान श्री राम बालि का वध करके उसका राज्य सुग्रीव को दिला दें तो वे श्री राम की मदद करेंगे ।

दरसल बालि सुग्रीव का भाई था और बहुत ही अधिक ताकतवर था । एक बार उसने रावण को अपने हाथों में दबाकर सातों द्वीपों की सैर कराई थी । तब से रावण बालि से बहुत अधिक डरता था और इसके पास नहीं आता था । एक बार की बात है बालि के राज्य पर एक राक्षस ने हमला कर दिया और बालि और उनके भाई सुग्रीव उसका वध करने के किए बाहर निकले ।

राक्षस एक गुफा के अंदर चला गया और बालि भी उसे मारने के लिए अंदर चला गया । बालि ने गुफा के द्वार पर सुग्रीव को तैनात किया ताकि वो राक्षस गुफा के द्वार से बाहर ना भाग पाए । सुग्रीव ने देखा कि गुफा के अंदर से खून की नदी बह रही है और अंदर से किसी के चिल्लाने की आवाज आ रही है ।

सुग्रीव ने सोचा कि राक्षस ने उसके भाई बालि को मार डाला है और वह अब सुग्रीव के राज्य को हड़प लेगा । यह सोचकर सुग्रीव ने गुफा का द्वार एक बहुत बड़े पत्थर से बंद कर दिया । सुग्रीव ने जब वापिस जाकर राज्य में यह खबर दी कि बालि की मृत्यु हो गई है तो सुग्रीव को किसकिंधा का नया राजा बना दिया गया ।

असल में बालि जिंदा बच गाया और उसने राक्षस को मार डाला । राक्षस को मारकर जब बालि वापिस आया तो उसने गुफा का द्वार बंद पाया । बालि लगा कि सुग्रीव ने राज्य के लालच में उसे धोका दिया है । बलि ने अपने राज्य में जाकर सुग्रीव को बहुत बुरी तरह मारा । सुग्रीव ने समझाने की कोशिश की लेकिन बलि नहीं माना ।

सुग्रीव जैसे तैसे अपनी जान बचाकर भागे और अपना राज्य खो बैठे । सुग्रीव ने कहा कि बिना राज्य के वो भगवान श्री राम की मदद नहीं कर सकते इसलिए अगर भगवान सुग्रीव को उनका राज्य वापिस दिला दें तो वे उनकी मदद जरूर करेंगे । भागवान श्री राम सुग्रीव की शर्त को मान गए ।

सुग्रीव का घमंड हुआ चूर

भगवान श्री राम ने योजना बनाई कि सुग्रीव जाकर बलि को युद्ध के लिए बुलाएंगे और भगवान श्री राम बाण मारकर उसे मार देंगे । बालि को यह वरदान प्राप्त था कि सामने वाले की आधी शक्ति उसके पास आ जाती थी और इसलिए बालि को कोई हारा नहीं पाता था ।

सुग्रीव ने बालि को युद्ध के लिए ललकारा । बालि गुस्से में आग बबूला हो गया और सुग्रीव को मारने के लिए बाहर आया । भगवान श्री राम ने सुग्रीव को एक माला दी थी जिससे सुग्रीव की पहचान हो सके । दरअसल बालि और सुग्रीव एक जैसे ही दिखते थे, बालि ने एक ही वार में सुग्रीव के गले की माला तोड़ दी ।


असल में भगवान को सुग्रीव को पहचानने के लिए माला की कोई जरूरत नहीं थी फिर भी भगवान ने बालि को नहीं मारा और सुग्रीव को पिटने दिया । बालि ने सुग्रीव को बहुत मारा और सुग्रीव की जान बहुत ही मुश्किल से बची ।

सुग्रीव को लगा कि माला के टूट जाने की वजह से यह सब हुआ है लेकिन भगवान के प्रति पिछली तीन चार गलतियां करने की वजह से ही सुग्रीव को इतनी मार पड़ी ।

दूसरी बार सुग्रीव ने अच्छे से माला पहनी और बालि को युद्ध के लिए ललकारा । इस बार भी बालि ने सुग्रीव के गले में पड़ी माला को पहले हीर वार में तोड़ दिया । इस बार सुग्रीव ने सोच लिया कि अब उनके प्राण नहीं बचेंगे । लेकिन इस बार भगवान श्री राम ने बालि को तीर मार दिया और उसकी वहीं पर ही मृत्यु हो गई ।


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🌹🪴गीता ज्ञान🪴🌹कटप्पा – महान भक्त, जिन्होंने अपनी दोनों आँखें भेंट दे दीं By वनिता कासनियां पंजाब. कटप्पा दोस्तों आप लोगों ने बाहुबली फिल्म जरूर देखी होगी । उसमे बताया गया है कि किस तरह एक राज्य के वफादार कटप्पा ने बाहुबली के मर जाने के बाद भी शाशन का साथ निभाया । दोस्तों क्या आप जानते हैं कि आखिर यह कटप्पा नाम शास्त्रों में कहाँ से लिया गया है । चलिए आपको बताते हैं।गीता ज्ञानआज हम कटप्पा नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानेंगे और जानेंगे कि उसने भगवान शिव को मांस का टुकड़ा और अपनी आँखें समर्पित क्यों कीं थी । कटप्पा का जन्म कालहस्ती के पास उदयपुर में एक शिकारी परिवार में हुआ था । वर्तमान के उदयपुर में जिसे उस समय उत्तर कुरु के नाम से जाना जाता था । आंध्र प्रदेश के राजमपेट में कटप्पा एक धनुर्धर एक दिन शिकार करने गया लेकिन जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला जिसमें शिवलिंग था ।कटप्पा भगवान शिव के भक्त थे और वह भगवान शिव को कुछ देना चाहते थे परंतु वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि शिव को भेंट कैसे और किस प्रलकार से करें । फिर उन्होंने मांस का एक टुकड़ा भेंट देने का विचार किया जो उन्हें शिकार करने से मिला था और मासूमियत से शिवलिंग पर मांस का टुकड़ा चढ़ा दिया और खुशी से यह विश्वास करते हुए चले गए कि भगवान शिव ने उनकी भेंट स्वीकार कर ली होगी ।मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो मंदिर से बहुत दूर रहता था । अगले दिन जब ब्राह्मण वहाँ पहुँचा तो शिवलिंग के बगल में मांस पड़ा हुआ देखकर दंग रह गया । लेकिन फिर उन्होंने यह सोचकर अपने मन को शांत किया कि यह किसी जानवर का काम होगा और उन्होंने मंदिर की सफाई की और अपने दैनिक अनुष्ठान किए और चले गए ।कटप्पा प्रतिदिन श्रद्धा भाव से पूजा पाठ करने लगेगाँव में कटप्पा अपने तरीके से शिवलिंग की पूजा करता था । वह शिकार के बाद शिवलिंग को देखने और उससे बात करने के लिए प्रतिदिन मंदिर जाता था और अपनी श्रद्धा भावना में मांस चढ़ाता था क्योंकि उसे पता नहीं था कि भगवान की पूजा कैसे की जाती है । हर सुबह ब्राह्मण यह सोचकर शिवलिंग की सफाई करते थे कि यह किसी जानवर ने किया होगा ।एक दिन कटप्पा शिकार के बाद फिर से मंदिर गया और शिवलिंग पर कुछ धूल देखी जिसे उसने साफ करने का फैसला किया । लेकिन कटप्पा ने पाया कि उसके पास पानी लाने के लिए कोई बर्तन नहीं है । वह पास में बहती नदी के पास गया और जैसे तैसे एक बर्तन ढूढ़कर पानी भरकर लाया । फिर शिवलिंग के पास वापस चला गया और उसने सारा पानी शिवलिंग के ऊपर डाल दिया ।जब ब्राह्मण वापस मंदिर में आया तो वह शिवलिंग पर मांस और पानी देखकर घृणा से भर गया । उसे एहसास हुआ कि कोई भी जानवर ऐसा नहीं कर सकता है और केवल इंसान ही ऐसा कर सकता है । ब्राह्मण की आँखों में आंसू भर आए और उसने भगवान शिव से पूछा कि आप अपने लिए ऐसा अपमान कैसे सहन कर सकते हैं ।ईश्वर के प्रति सच्चा प्यार और भक्तिभगवान शिव ने अपने भक्त ब्राह्मण को उत्तर दिया कि जिसे तुम अपमान समझते हो, मेरे लिए दूसरे भक्त की ओर से भेंट है । मैं उनकी भक्ति से बंधा हूँ और जो कुछ भी वह प्रदान करता है उसे स्वीकार करता हूँ । भगवान शिव ने ब्राह्मण से कहा कि यदि आप उनकी भक्ति को देखना चाहते हैं तो पास में ही कहीं छिप जाएँ क्योंकि वे आने वाले हैं । ब्राह्मण झाड़ी के पास छिप गए ।कटप्पा हमेशा की तरह मांस लेकर पहुँचा तो यह देखकर हैरान रह गया कि शिव हमेशा की तरह उसकी भेंट स्वीकार नहीं कर रहे थे । कटप्पा ने सोचा कि उसने ऐसा क्या किया है कि शिव उसकी भेंट स्वीकार नहीं कर रहे हैं । उसने शिवलिंग को करीब से देखा और पाया कि शिवलिंग की दाहिनी आँख से कुछ रिस रहा था । कटप्पा ने शिवलिंग पर कुछ जड़ी बूटियां डाल दीं ताकि वो ठीक हो सकें लेकिन कटप्पा रक्त को रोकने में असफल रहे ।अंत में कटप्पा ने अपनी आँखें देने का फैसला किया । उसने चाकू निकाल कर अपनी दाहिनी आँख को निकालकर शिवलिंग पर रख दिया । खून रुक गया और कटप्पा ने राहत की सांस ली । लेकिन तभी उसने देखा कि अब बाई आँख से खून आने लगा है । उसने तुरंत अपनी दूसरी आँख निकालने के लिए चाकू निकाला । उसे लगा कि दोनों आँखों के बिना वह नहीं देख पाएगा कि उसे आँख कहाँ रखनी है ।अपनी भक्ति भावना में उसने शिव पर पैर भी रख दियाउसने अपना एक पैर शिवलिंग की आँख पर रखा और अपनी दूसरी आँख भी निकाल कर भगवान शिव को अर्पित कर दी । भगवान शिव के प्रति कटप्पा की अपार भक्ति देखकर ब्राह्मण हैरान रह गए थे । कटप्पा की भक्ति देखकर भगवान शिव प्रकट हुए और उसकी दृष्टि लौटा दी । कटप्पा ने भगवान शिव को प्रणाम किया और भगवान शिव को देख कर उनकी आँखों में खुशी के आंसू आ गए ।एक आदिवासी को संत की उपाधि प्रदान करते हुए भगवान ने दोहराया कि यह प्रभु के लिए सच्चा प्यार और भक्ति है ना कि हमारे द्वारा की जाने वाली प्रार्थना और अनुष्ठान, जो प्रभु को अपने पूरे हृदय से प्रेम करते हैं वही उसे प्राप्त करने की आशा कर सकते हैं ।तो दोस्तो आपको यह कहानी कैसी लगी आप कमेंट करके हमें अवश्य बताएं । दोस्तों क्या आप जानते हैं कि भारत देश में न जाने कितने लोग इस तरह के सच्चे श्रद्धालुओं का मजाक उड़ाते हैं । हमाराआपसे अनुरोध है इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें । दोस्तों हमें श्रद्धालुओं की भावनाओं को समझना चाहिए न कि उनका मजाक उड़ाना चाहिए । हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि इस दुनिया में अश्रद्धालुओं को भी सम्मान मिलना चाहिए लेकिन कुछ थोड़े बहुत श्रद्धालुओं को उनका अधिकार मिलना चाहिए ।इसी तरह की धार्मिक और मजेदार पोस्ट को पड़ते रहने के लिए हमारा व्हाट्सप्प ग्रुप ज्वाइन अवश्य करें । ग्रुप ज्वाइन कररने के लिए यहाँ क्लिक करें – Join Whatsapp । आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

  🌹🪴  गीता ज्ञान 🪴🌹 कटप्पा – महान भक्त, जिन्होंने अपनी दोनों आँखें भेंट दे दीं   By वनिता कासनियां पंजाब. कटप्पा दोस्तों आप लोगों ने बाहुबली फिल्म जरूर देखी होगी । उसमे बताया गया है कि किस तरह एक राज्य के वफादार कटप्पा ने बाहुबली के मर जाने के बाद भी शाशन का साथ निभाया । दोस्तों क्या आप जानते हैं कि आखिर यह कटप्पा नाम शास्त्रों में कहाँ से लिया गया है । चलिए आपको बताते हैं। गीता ज्ञान आज हम कटप्पा नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानेंगे और जानेंगे कि उसने भगवान शिव को मांस का टुकड़ा और अपनी आँखें समर्पित क्यों कीं थी । कटप्पा का जन्म कालहस्ती के पास उदयपुर में एक शिकारी परिवार में हुआ था । वर्तमान के उदयपुर में जिसे उस समय  उत्तर कुरु  के नाम से जाना जाता था । आंध्र प्रदेश के राजमपेट में कटप्पा एक धनुर्धर एक दिन शिकार करने गया लेकिन जंगल में उन्हें एक मंदिर मिला जिसमें शिवलिंग था । कटप्पा भगवान शिव के भक्त थे और वह भगवान शिव को कुछ देना चाहते थे परंतु वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि शिव को भेंट कैसे और किस प्रलकार से करें । फिर उन्होंने मांस का एक टुकड़ा...

भगवान राम का जन्म और अयोध्या में प्रवेश By वनिता कस्निया पंजाब भगवान राम का अवतार जीवों पर दया करने के लिए था । भगवान भारत भूमि पर 24 अवतार लेते हैं । कृष्ण भगवान का अवतार जीवों पर दया करने के लिए था । इसी तरह बाकी के अवतार भी जीवों का कल्याण करने के लिए थे । लेकिन एक दिन भगवान कल्कि आयेंगे और घोड़े पर सवार होकर सभी पापियों को मार देंगे । भगवान कल्कि गीता का ज्ञान नहीं देंगे, भगवान कल्कि अपने हाथ में तलवार लेकर सभी पापियों को मार देंगे । अब्दुल रहीम खान खाना ने जब रामचरितमानस पढ़ी तब उन्होंने कहा कि कि रामचरितमानस केवल हिंदुओं का ग्रंथ नहीं है वल्कि यह तो संपूर्ण मानव जाति का ग्रंथ है । गोस्वामी जी कहते हैं कि जो रामचरितमानस सरोवर में श्रद्धा पूर्वक स्नान करेंगे वे इस संसार रूपी सूरज की किरणों से नहीं जलेंगे । यह भी पढ़ें – माता कैकई का चरित्र वर्णाश्रम में विश्वास रखने वालों का भी रामचरितमानस से उद्धार होगा और जो विश्वास नहीं रखते हैं उनका भी उद्धार होगा । राम भगवान का जन्म जगत के मंगल के लिए ही हुआ । राम किसी सम्प्रदाय विशेस नहीं हैं । राम का एक अर्थ है जो सभी राष्ट्रों का मंगल करते हैं वे हैं राम । भगवान राम किसी एक के नहीं । कोई भी श्री राम कहेगा उसका कल्याण होगा । गोस्वामी तुलसीदास जी विनयपत्रिका में कहते हैं कि अगर जीव राम नाम नहीं जपेगा तो उसे कभी भी सुख मिलने वाला नहीं है । अब्दुल राम रहीम खान खाना ने कहा कि रामचरित मानस हिंदुओं के लिए वेद है और मुसलमानों के लिए कुरान है । भगवान राम का जन्म भगवान राम ने जन्म लेते ही सारे अनर्थ समाप्त कर दिए । भगवान राम इतना सुंदर रो रहे थे कि 702 महलों में आवाज जा रही थी । महाराज दशरथ बहुत प्रसन्न हो गए । जिनका राम सुनने से सुभ हो जाता है वो श्री राम दशरथ जी के यहां अवतरित हुए । जब दसरथ जी को पता चला तो कि प्रभु राम उनके यहां अवतरित हुए हैं तो वे सिंहासन से कूद पड़े । दशरथ जी स्वयं महर्षि वसिष्ठ जी के पास गए । जब प्रभु श्री राम को वसिष्ठ जी ने देखा तब कोशल्या जी से कहा कि बालक बहुत प्यारा है मुझे गोद में लेने का मन कर रहा है । चारों ओर बधाईयां बज रहीं हैं । जब भगवान श्री राम का जन्म हुआ तब एक दिन एक महीने का हुआ । सूर्य देव ने कहा कि वे कभी विश्राम नहीं लेते लेकिन आज उनके वंश में भगवान का जन्म हुआ है तो उन्होंने छुट्टी लेने का विचार किया और एक दिन एक महीने का हो गया । यह रहस्य किसी को पता नहीं चला । वशिष्ठ जी ने प्रभु का नामकरण किया । उन्होंने कहा कि जो सभी सुखों आश्रय हैं और सारे लोकों को विश्राम देने वाले हैं वे राम हैं । आज प्रभु अपने 6 ऐश्वर्यों को भूल गए और तब उनका प्रथम जन्मोत्सव मनाया गया । राम जी युद्ध जीतकर आए हनुमान जी ने भरत जी को बताया कि प्रभु श्री राम युद्ध में शत्रुओं को जीत कर आ रहे हैं । प्रभु श्री राम 14 वर्ष पहले चले गए थे अब वे युद्ध में सभी शत्रुओं को जीत कर आ रहे हैं । देवता गण उनका सुंदर यश गा रहे हैं और प्रभु श्री राम लक्ष्मण जी, माता सीता और हितकर मित्रों के साथ आ रहे हैं । प्रभु श्री राम इतने कुशल हैं कि शत्रु भी उनका यश गान किया करते हैं । दशरथ जी तपस्या करते हैं कि राम जी ही उनके बेटे बने और रावण भी तपस्या करता है कि राम जी ही उनके शत्रु बनें । श्री राम कभी हारते नहीं इसके पीछे क्या कारण है? क्या प्रभु की ईश्वरता इसका कारण है? नहीं । श्री राम का संकेत है कि अगर मेरे जैसा आचरण करोगे तो तुमको भी वही सफलता मिलेगी जो मुझे मनुष्य के रूप में मिली । राम जी के जैसा ही व्यवहार करना चाहिए । राम जी कभी पराजित नहीं होते हैं क्योंकि वे धर्म पर हैं । धर्म का अर्थ है अपने कर्तव्य का निष्ठा पूर्वक पालन करना । जब राम रावण संग्राम हो रहा था और बाल्मिकी जी कहते हैं कि रावण युद्ध में मरने का निश्चय करके आया था । जो व्यक्ति युद्ध में मरने का निश्चय करके आया है वह कितना भयंकर लड़ेगा । वाल्मिकी जी कहते हैं कि जिस तरह आकाश के समान केवल अकास ही है, समुद्र के समान समुद्र ही है उसी तरह राम जी के समान राम जी ही हैं, रावण के समान रावण ही है और राम रावण युद्ध के समान राम रावण युद्ध ही है और कोई युद्ध ऐसा नहीं हुआ । रावण रथ पर मौजूद था और प्रभु श्री राम जमीन पर थे । रावण के पास अनेक हथियार थे तब विभीषण को भगवान की सफलता पर संदेह हो गया । विभीषण भगवान के प्रेम के कारण उनका ऐश्वर्य भूल गए और प्रभु श्री राम से कहा कि हे राघव आपके पास रथ नहीं है, कवच नहीं है, चरणों में जूते नहीं हैं आप इस बलवान शत्रु को किस तरह जीत सकेंगे । रावण आपके विपक्ष ने है जिसने देवताओं को जीता है । आप किस तरह इस बलवान शत्रु को किस विधि से जीतेंगे । कौन सा रथ होगा, कवच कौनसा, ढाल तलवार बाण इत्यादि क्या होंगे । प्रभु श्री राम ने कहा कि हे मित्र बिना रथ के कोई भी रथी युद्ध जीत नहीं सकता । रावण का रथ टूट जायेगा और उसके सारथी मार जायेंगे लेकिन मेरा रथ ऐसा है जो कभी नहीं टूटेगा । भगवान राम ने कहा कि ही मित्र जिसका धर्म रूप रथ जिसके पास होता है उसे कहीं भी पराजय नहीं मिलती और वो रथ में ले आया हूं । जब में अवतार लेकर आया तो साकेत से ही वो धर्म रूप रथ लेकर आया । रथ हमेशा दिन में ही चला करता है । भगवान राम का जन्म और अयोध्या में प्रवेश जब रघुकुल के महाराज रघु ने कुबेर पर आक्रमण करने का निश्चय किया तो वे शाम के समय रथ में नहीं गए । इसी तरह जिस दिन से भगवान श्री राम कोशल्या जी के गर्भ में आए तभी से संसार में खुसियां आ गईं । CategoriesRamayan TagsRamayan राजा पौंड्रक का क्या हुआ जो अपने आप को भगवान कहता था । बागेश्वर धाम वाले महाराज जी जिनका चर्चा पूरे विश्व में है Leave a Comment Comment Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment. बागेश्वर धाम लंका को असल में हनुमान जी ने नहीं जलाया था मोक्ष पाना मुश्किल है या आसान बागेश्वर बाबा से न्यूज़ चैनलों के सीधे सवाल बगेश्वर धाम दिव्य दरबार में पत्रकार लेने आए परीक्षा बागेश्वर धाम वाले महाराज जी जिनका चर्चा पूरे विश्व में है लोकप्रिय लालच से बचने का उपाय श्रृंगी ऋषि कौन थे, श्रृंगी ऋषि एक हिरण से पैदा कैसे हुए? 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भगवान राम का जन्म और अयोध्या में प्रवेश By वनिता कस्निया पंजाब  भगवान राम का अवतार जीवों पर दया करने के लिए था । भगवान भारत भूमि पर 24 अवतार लेते हैं । कृष्ण भगवान का अवतार जीवों पर दया करने के लिए था । इसी तरह बाकी के अवतार भी जीवों का कल्याण करने के लिए थे । लेकिन एक दिन भगवान कल्कि आयेंगे और घोड़े पर सवार होकर सभी पापियों को मार देंगे । भगवान कल्कि गीता का ज्ञान नहीं देंगे, भगवान कल्कि अपने हाथ में तलवार लेकर सभी पापियों को मार देंगे । अब्दुल रहीम खान खाना ने जब रामचरितमानस पढ़ी तब उन्होंने कहा कि कि रामचरितमानस केवल हिंदुओं का ग्रंथ नहीं है वल्कि यह तो संपूर्ण मानव जाति का ग्रंथ है । गोस्वामी जी कहते हैं कि जो रामचरितमानस सरोवर में श्रद्धा पूर्वक स्नान करेंगे वे इस संसार रूपी सूरज की किरणों से नहीं जलेंगे । यह भी पढ़ें – माता कैकई का चरित्र वर्णाश्रम में विश्वास रखने वालों का भी रामचरितमानस से उद्धार होगा और जो विश्वास नहीं रखते हैं उनका भी उद्धार होगा । राम भगवान का जन्म जगत के मंगल के लिए ही हुआ । राम किसी सम्प्रदाय विशेस नहीं हैं । राम का एक अर्थ है जो सभी राष्ट्रों का मंगल ...